Tuesday, May 28, 2024
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“नाइटिंगेल ऑफ इंडिया” सरोजिनी नायडू की पुण्यतिथि

-आकांक्षा थापा

इतिहास में दो मार्च 1949 का दिन सरोजिनी नायडू की पुण्यतिथि के रूप में दर्ज है। राजनीतिक कार्यकर्ता, महिला अधिकारों की समर्थक, स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष सरोजिनी नायडू को उनकी प्रभावी वाणी और ओजपूर्ण लेखनी के कारण ‘‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’’ कहा गया।
13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मीं सरोजिनी के पिता अघोरेनाथ चट्टोपाध्याय हैदराबाद के निजाम कॉलेज में प्रिंसिपल थे। सरोजिनी ने यूनिवर्सिटी आफ मद्रास के अलावा लंदन के किंग्स कॉलेज और उसके बाद कैंब्रिज के गिरटन कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की।

उनकी लेखनी ने भी देश के बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया। महज 12 साल की उम्र में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। 16 साल की उम्र में वो हायर एजुकेशन के लिए इंग्लैंड चली गईं। वहां उन्होंने किंग्स कॉलेज, लंदन और गिरटन कॉलेज में पढ़ाई की। 19 साल की उम्र में उनकी शादी डॉ. गोविंद राजालु नायडू से हो गई। 1914 में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। यहीं से वो देश की आजादी के आंदोलन से जुड़ गईं। गांधी के भारत आने से पहले उन्होंने गांधी जी के साथ दक्षिण अफ्रीका में भी काम किया। 1925 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। वो पहली भारतीय महिला थीं जो कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।

उन्होंने भारतीय महिलाओं के बारे में कहा था- “जब आपको अपना झंडा संभालने के लिए किसी की आवश्यकता हो और जब आप आस्था के अभाव से पीड़ित हों तब भारत की नारी आपका झंडा संभालने और आपकी शक्ति को थामने के लिए आपके साथ होगी और यदि आपको मरना पड़े तो यह याद रखिएगा कि भारत के नारीत्व में चित्तौड़ की पद्मिनी की आस्था समाहित है।”
सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1300 पंक्तियों की कविता ‘द लेडी ऑफ लेक’ लिखी थी। फारसी भाषा में एक नाटक ‘मेहर मुनीर’ लिखा। ‘द बर्ड ऑफ टाइम’, ‘द ब्रोकन विंग’, ‘नीलांबुज’, ट्रेवलर्स सांग’ उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। सरोजिनी देश की पहली महिला राज्यपाल थीं। वो इस पद पर अपने निधन तक रहीं। 2 मार्च 1949 को लखनऊ में उन्हें हार्ट अटैक आया और उनका निधन हो गया। सरोजिनी नायडू की 135वीं जयंती पर यानी 13 फरवरी 2014 को भारत में राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत की गई। स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाली सरोजिनी नायडू ने भारत को आजादी दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था।

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