Saturday, March 2, 2024
उत्तराखंडराज्य

गोरखा रेजिमेंट के जवान करन देव बहादुर लेह-लद्धाख सीमा पर अपना फर्ज निभाते हुए शहीद

देवभूमि उत्तराखंड …..सैन्य भूमि वीरों की भूमि और वतन पर जान न्योछावर करने वाले जांबाज़ सैनिकों की भूमि है …. पहाड़ के हर गाँव हर घर का रिश्ता भारतीय सेना से जुड़ा है इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उत्तराखंड को सैन्य धाम का नाम दिया ही ….  एक बार फिर उत्तराखण्ड के एक ऐसे ही जाँबाज़ बेटे ने अपनी जान ड्यूटी निभाते हुए न्योछावर कर दी है। आपको बता दें कि लद्दाख बॉर्डर पर तैनात उत्तराखंड के जवान देव बहादुर के शहीद होने की दुखद खबर आते ही किच्छा के गौरीकला निवासी जवान के परिवार में कोहराम सा मच गया है

सेना से जुड़े सूत्र बताते हैं कि शनिवार रात को गश्त के दौरान जवान देव बहादुर का पैर जमीन पर बिछी डायनामाइट पर पड़ गया और इस दौरान हुए धमाके में वे शहीद हो गए। घटना की जानकारी परिवार को रात करीब 11 बजे मिली। 


पहाड़ के इस लाल की भर्ती साल 2016 में भारतीय सेना के 6/1 गोरखा रेजिमेंट के बैच में हुई थी….बचपन से ही कबड्डी के खेल में देव ने काफी नाम कमा लिया था .. स्वभाव से बेहद शांत और गंभीर रहने वाले देव बहादुर को संगीत से भी बेहद प्रेम था और वो अपने दोस्तों में भी काफी घुलमिल कर वक़्त गुज़ारा करते थे …. छोटी सी ही उम्र में पहाड़ के लाल के शहीद होने की इस घटना की सुचना जैसे ही शहीद देव बहादुर के गाँव पहुंची खबर मिलते ही पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ पड़ी।मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने किच्छा निवासी 24 वर्षीय जवान करन देव उर्फ देव बहादुर की शहादत को नमन किया। गोरखा रेजिमेंट के जवान करन देव लेह-लद्धाख सीमा पर अपना फर्ज निभाते हुए शहीद हो गए। वह गौरीकला किच्छा के निवासी थे।

मुख्यमंत्री ईश्वर से शहीद के परिजनों को धैर्य प्रदान करने की प्रार्थना की है।केवल चौबीस साल की उम्र में लद्दाख जैसे चुनौती भरे इलाके में तैनात रहे शहीद देव बहादुर जल्द ही अपनी इकलौती बहन गीता की धूमधाम से शादी करने वाले थे जिसके लिए उन्होंने कई सपने भी देखे थे तैयारियां भी शुरू कर दी थी लेकिन होनी को तो जैसे कुछ और ही मंजूर था और आज उस भाई की शहादत की खबर से गीता  अपने भाई के अंतिम दर्शन का इंतज़ार कर रही है। गांव के लोग बताते हैं कि देव बहादुर का बचपन काफी मुफलिसी और गरीबी में बीता था और उनके पिता शेर बहादुर बचपन से मजदूरी करके जीवनयापन करते थे और सीमित आय में उन्होंने बच्चों को पढ़ाया था और भारतीय सेना में इस मुकाम तक पहुँचाया की आज उनकी शहादत पर देश प्रदेश और लाखों उत्तराखंड वासियों को गर्व महसूस हो रहा है  

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