Thursday, December 8, 2022
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शारदीय नवरात्रि 2021 : आज तृतीय तिथि मां चंद्रघंटा और चतुर्थी तिथि मां कूष्माण्डा का संजोग, जानें पूजन विधि, मंत्र और भोग

नवरात्रि के पावन पर्व पर मां के 9 रूपों की पूजा- अर्चना की जाती है। नवरात्रि के नौ दिवसीय उत्सव में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। हालाँकि, इस बार नवरात्रि 8 ही दिनों की है। हिन्दू के पञ्चाङ्ग के अनुसार, 9 अक्टूबर (नवरात्रि के क्रमशः तीसरे और चौथे दिन) को भक्तों द्वारा मां चंद्रघंटा और मां कुष्मांडा की पूजा की जाएगी। आज नवरात्री के तीसरे दिन 9 अक्टूबर को तृतीय और चतुर्थी का शुभ संयोग पडा हैं। अर्थात आज के दिन मां चंद्रघंटा और मां कुष्मांडा दोनों का ही शुभ पूज्य दिन हैं। तृतीय तिथि पर मां के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा और चतुर्थी तिथि पर मां के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्माण्डा की पूजा- अर्चना की जाती है।

देवी चंद्रघंटा : देवी चंद्रघंटा निडरता और साहस का स्वरुप है। चंद्रखंड, अर्थात चंडिका या रणचंडी के रूप में भी जानी जाने वाली, उनकी दस भुजाएँ हैं और उनके हाथों में हथियारों का एक समूह है। उनके माथे पर घंटी के आकार का आधा चाँद होने के कारण, उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता हैं। माता चंद्रघंटा सभी बुराई और दुष्टों को नष्ट करने के लिए एक बाघ की सवारी करती है। शिव महा पुराण के अनुसार, चंद्रघंटा चंद्रशेखर के रूप में भगवान शिव की “शक्ति” है। शिव के प्रत्येक पहलू शक्ति के साथ हैं, इसलिए वे अर्धनारीश्वर हैं।

मां चंद्रघंटा की कहानी
जब भगवान शिव राजा हिमवान के महल में पार्वती से शादी करने पहुंचे, तो वे अपने बालों में कई सांपों के साथ भूत, ऋषि, पिसाच, अघोरी और तपस्वियों की एक अजीब शादी के जुलूस के साथ एक भयानक रूप में आए। यह देख पार्वती की मां मैना देवी बेहोश हो गईं। तब पार्वती ने देवी चंद्रघंटा का रूप धारण किया था। फिर उन्होंने भगवान शिव को एक आकर्षक और सामान्य राजकुमार का रूप लेने के लिए मना लिया। बाद में दोनों ने शादी कर ली। ऐसा कहा जाता है कि राक्षसों के साथ उनकी लड़ाई के दौरान, उनकी घंटी से उत्पन्न ध्वनि ने हजारों दुष्ट राक्षसों को मृत्यु देवता के निवास में भेज दिया। देवी हमेशा अपने भक्तों के शत्रुओं का नाश करने के लिए उत्सुक रहती है, राक्षसों के साथ उनकी लड़ाई के दौरान, उनकी घंटी से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उस कारण हजारों दुष्ट राक्षसों को वह मृत्यु दण्ड देती है।

देवी कुष्मांडा : नवरात्रि का चौथा दिन देवी कुष्मांडा को समर्पित है, जिन्हें अपनी मुस्कान से ब्रह्मांड का निर्माण करने के लिए जाना जाता है। मां कुष्मांडा को आठ हाथों में कमंडल, धनुष, तीर, कमल, त्रिशूल, अमृत का एक घड़ा, गदा और एक चक्र पकड़े हुए दिखाया गया है और वह एक शेर की सवारी करती है। मां कूष्मांडा अपने उपासक को सुख, समृद्धि और रोग मुक्त जीवन प्रदान करती हैं।


मां कुष्मांडा की कहानी
ऐसा माना जाता है कि जब ब्रह्मांड का अस्तित्व नहीं था और हर जगह पूर्ण अंधकार के अलावा कुछ भी नहीं था, तब दिव्य प्रकाश की एक किरण प्रकट हुई। यह जल्द ही आकार लेने लगा और वह भी एक महिला का रूप। दिव्य महिला, ब्रह्मांड की पहली सत्ता मां कुष्मांडा कहलाती थी। वह मुस्कुराई और अंधेरा दूर हो गया। उसने सूर्य, ग्रहों, तारों और आकाशगंगाओं की रचना की और सूर्य के केंद्र में आसन ग्रहण किया।

पूजन का समय : पंचांग के अनुसार 8 अक्टूबर, शुक्रवार को तृतीया तिथि का आरंभ सुबह 10:50 पर हुआ और 9 अक्टूबर, शनिवार को सुबह 7:51 बजे तृतीया तिथि का समापन हुआ। इसके बाद चतुर्थी की तिथि प्रारंभ हुआ।


पूजा विधि :

  • सुबह उठकर स्नान करने के बाद पूजा के स्थान पर गंगाजल डालकर उसकी शुद्धि कर लें।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • दोनों माताओं को जल अर्पित करें
  • मां को अक्षत, सिन्दूर और लाल पुष्प अर्पित करें, प्रसाद के रूप में फल और मिठाई चढ़ाएं।
  • धूप और दीपक जलाकर मां की आरती करें।

 


 

मां चंद्रघंटा पूजा मंत्र
पिंडजप्रवरारुधा चन्दकोपास्त्रकैर्युत प्रसादम तनुते महयम चंद्रघण्टेती विश्रुत
मां चंद्रघंटा का भोग- मां को केसर की खीर और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए। पंचामृत, चीनी व मिश्री भी मां को अर्पित करनी चाहिए।

मां कुष्मांडा पूजा मंत्र
सुरसंपूर्णकलाशम रुधिरालुप्तमेव च दधाना हस्तपद्माभ्यं कुष्मांडा शुभदास्तुमे
मां कूष्मांडा का भोग- मां कूष्मांडा को हलवे और दही का भोग लगाएं।

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